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| सीपेक |
क्या है चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा?
सीपेक अर्थात चाइना पाकिस्तान इकनोमिक कॉरिडोर, चीन द्वारा उठाए गए बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का एक अंग है। इसके तहत वह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को अपने शहर कसगार से जोड़ेगा। यह एक बड़ी परियोजना है। चीन के द्वारा इसमें बिलियन्स डॉलर्स का निवेश किया जाएगा। बड़ी बड़ी सुरंगों, रेलवे मार्ग, सड़क मार्ग और हवाई मार्ग के जरिये ग्वादर बंदरगाह को चीन के कसगार से जोड़ा जाएगा।चीन को रणनीतिक बढ़त देगा सीपेक
आपको बता दें कि इरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच से स्ट्रेट आफ होर्मुज गुजरता है। यहां से विश्व का 1/3 तेल का निर्यात होता है। चीन को स्ट्रेट आफ होर्मुज के रास्ते तेल का आयात करना काफी महंगा पड़ता है। उसे अपने देश तक तेल आयात करने के लिए स्ट्रेट आफ होर्मुज, हिंद महासागर, स्ट्रेट आफ मलक्का और दक्षिणी चीन सागर को पहले पार करना पड़ता है। तब जाकर देश के भीतर तेल का आयात होता है। इसमे समय और धन दोनों की काफी ज्यादा खपत होती है। इसी खपत को कम करने के लिए चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की शुरूआत की।वहीं दूसरी ओर दक्षिणी चीन सागर को लेकर चीन और दक्षिणी पूर्वी देशों के बीच कई मतभेद चल रहें हैं। चीन दक्षिण चीन सागर पर अपना हक जताता है। वहीं दूसरी ओर वियतनाम, फिलीपीन्स, मलेसिया और ब्रुनेई भी अपना कुछ कुछ हक साउथ चाइना सी पर जता रहें हैं। कुछ वर्ष पहले ही चीन के दक्षिणी चीन सागर पर गैराधिकारिक दावे को लेकर फिलीपींस ने अंतराष्ट्रीय न्यायालय में केस किया था। इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने अपना फैसला फिलीपींस के पक्ष में सुनाया।
पिछले कुछ सालों से अमेरिका और चीन के बीच तनातनी बढ़ी है। इस कारण रणनीतिक बढ़त पाने के लिए अमेरिका दक्षिणपूर्वी देशों की मदद कर रहा है। नए किस्म के हथियार, सॉफ्टवेयर, जहाज आदि की सप्लाई अमेरिका द्वारा इन देशों में की जा रही है।
चीन को पता है अगर भविष्य में खुदा न खास्ता कुछ गड़बड़ हुआ तो उसे एक बहुत बड़ी मार पड़ सकती है। अगर स्ट्रेट ऑफ मलक्का की सप्लाई चैन को रोक दिया जाता है, तो चीन में होने वाले तेल का आयात ठप पड़ जाएगा। इसके चलते अर्थव्यवस्था में तंगी, गृहयुद्ध, भुखमरी आदि जैसी स्थिति पनप सकती है। इस रूप में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा चीन के लिए टॉनिक का काम करेगा। इस परियोजना के चलते उसके अरबो डॉलर्स की खपत कम हो जाएगी।
इस परियोजना के अंतर्गत चीन, मिडिल ईस्ट और सेंट्रल एशियाई देशों के साथ अच्छे संबंध स्थापित कर सकेगा। चीन की लगभग 94 प्रतिशत आबादी उसके पूर्वी हिस्से में रहती है। इस परियोजना के चलते चीन के पश्चिमी हिस्से में उद्योगिक गतिविधियां पहले के मुक़ाबले तेज़ी से बढ़ेंगी और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। इस कारण पूर्वी आबादी का कुछ हिस्सा पश्चिम की ओर स्थानांतरित हो सकता है।
सीपेक और भारत
गौरतलब बात है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर में आता है। पाक अधिकृत कश्मीर भारत का हिस्सा है। वहां वह बिना भारत की अनुमति के कोई परियोजना शुरू नहीं कर सकता है।निकट भविष्य में चीन ग्वादर पोर्ट की सहायता से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते हमारे देश में होने वाले तेल के आयात को रोक सकता है। इसी को काउंटर करने के लिए भारत ग्वादर पोर्ट से कुछ ही दूरी पर ईरान के चाबहार पोर्ट पर निवेश कर रहा है। इसके जरिये भारत अफगानिस्तान के रास्ते ईरान को जोड़ेगा। इस परियोजना में हम 20 बिलियन डॉलर्स का निवेश ईरान में करेंगे। और 300 मिलियन डॉलर्स का निवेश अफगानिस्तान में करेंगे।
हाल ही में अमेरिका द्वारा ईरान के कमांडर क़ासिम सुलेमान को मारे जाने के बाद वैश्विक राजनीति ने एक नया मोड़ लिया है। इस घटना के चलते ईरान और अमेरिका के रिश्तों में दरारें आई हैं। अमेरिका ने ईरान पर कई सैंक्शन्स लगा रखे हैं। इस कठिन परिस्थिति में ईरान को एक नई महाशक्ति की तलाश है। इस रूप में उसकी नजदीकियां चीन के साथ बढ़ सकती हैं। जो किसी भी लिहाज से भारत के लिए सही नहीं होगा।
पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा है बलोचिस्तान। यहां विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक गैसों और संसाधनों का अंबार है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को बल देने में इस हिस्से का अहम योगदान है। इस हिस्से में पाकिस्तान की महज 6 फीसदी आबादी ही रहती है। गौरतलब बात है कि 1949 में पाकिस्तान ने इस इलाके को गैरअधिकृत ढंग से अपने कब्जे में लिया था। तब से लेकर आज तक यह क्षेत्र अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहा है। इस दौरान पाकिस्तानी आर्मी ने कई बलोच नेताओं को मारा है।
सीपेक का रास्ता बलोचिस्तान से होकर ही जाएगा। इस रूप में अंतरराष्ट्रीय मंचो पर भारत को बलोचिस्तान और वहां पर पाकिस्तानी आर्मी की बर्बरता के मुद्दे को जोर शोर से उठाना चाहिए। इसके अलावा बलोचिस्तान की आज़ादी के पक्ष में हमें बलोच लोगों का साथ देना चाहिए। वहीं दूसरी ओर सीपेक को लेकर पाकिस्तान के कई आतंकवादी संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। इस परियोजना में वह अपनी हिस्सेदारी की मांग रहें हैं।
इस परियोजना में लगभग 46 बिलियन डॉलर्स का खर्चा आएगा। सीपेक को लेकर चीन के समक्ष कई सारी चुनौतियां खड़ी हैं। इस कारण चीन इसे लेकर पुनर्विचार भी कर रहा है।


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